स्वरचित ग़ज़ल की पंक्तियां :-
फिरते रहे मौजों में दूर अपना किनारा रहा
उल्टी धार ही मेरे सफ़र का सहारा रहा
बाहर बदला बहुत कुछ, अंदर कुछ भी नहीं
तुम मेरे न हो सके, मगर मैं तुम्हारा रहा
दोनों तरफ़ के मामले में सब्र होता ही नहीं
बहुत लंबा तेरा इंतज़ार मेरा एकतरफ़ा रहा
एक सिरा हाथ लगने पर रास न आया हमको
छूट गया था जो कभी वही मन का प्यारा रहा
मंज़िल का क्या बना पूछ के शर्मिंदा न कर
बस यूं समझ ले तन्हा चला था मैं तन्हा रहा
मेरे बाद आने वालों तुम सब महरूम रह गए
तुम्हारे हिस्से न ख़त रहे न वो डाकख़ाना रहा
- नेहाल अहमद
(वर्तमान में मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी के बीएड 2021-23 में अध्ययन; अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (2015-2021) और जवाहर नवोदय विद्यालय (2007-2014) से भी रहा अध्ययन)
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